सीने से एक दीया जलता है

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– इंटरनेट कविता – अनिल चावड़ा

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सीने पर एक दीया चमकता है,

तो यह अंधकार के सारे अहंकार को कुचल देता है।

वह इसे सब कुछ देता है

हर चीज का मूल रूप

इतना बड़ा दान करें

तब भी चुप रहती है

अपने आप से कुछ और उम्मीद मत करो!

अँधेरे से लड़ने के लिए

आपने शिक्षा कहाँ से प्राप्त की?

किया गुरु की कृपा से

तपस्या का यह तरीका?

हे दीपक, वह शाश्वत क्षण, तुम उस क्षण को प्रकट करते हो…

— रमेश पारेख

इस गाने में रमेश पारेख ने बताया है कि कैसे एक दीया हमें कुछ सिखा सकता है। रमेश पारेख गुजराती साहित्य के प्रकाश हैं, उनकी कविता के दीपों ने पूरे साहित्य जगत को रोशन किया है। ‘दीवाली’ शब्द का अर्थ ‘दी वॉल्वो’ है। दीपक को केवल घर की दहलीज पर ही नहीं, बल्कि हैयान की दहलीज पर भी रखना चाहिए। तभी हमारा दिन पलटता है और दिवाली सार्थक हो जाती है। यह कविता भी रोशनी का त्योहार आने पर दूरी को दहलीज पर रखने जैसा है।

घर बंद होने पर भी नियमित रूप से साफ-सफाई न करने पर मकड़ी के जाले उड़ने लगते हैं। समय की धूल उसे बर्बादी की ओर धकेलने लगती है। मनुष्य स्वयं भी एक परिक्रामी घर है। उस भजन को याद करो, ‘जीव, गुमान में क्या चल रहा है, तुम्हें किराए के मकान में रहना है!’ अगर आप किराए के घर में रहते हैं, तो आप बिना किराया चुकाए फ्री नहीं हैं! इस किराए का मतलब है हमारी ईमानदारी से की गई मेहनत, हम इस इमारत में तब तक खुशी से रह पाएंगे जब तक हम अपनी राजनीति की खुशबू फैलाते रहेंगे।

नहीं तो हम घर में रहेंगे, लेकिन असली मालिक अक्सर हमें अंदर से खटखटाएगा क्योंकि हम किराया नहीं देते हैं। याद रखें, जब भी आप कुछ गलत करेंगे तो आपका विवेक आपको अंदर से बाहर तक काटेगा। अगर ‘गलत’ की ऐसी परतें बार-बार आती हैं तो समझ लेना चाहिए कि हमें भी भीतर से अंधेरा होने लगा है। और दूर-दूर तक दीपक जलाना चाहिए। जब चौक के बीच में एक दीया जलाया जाता है, तो उसके चारों ओर का सारा अँधेरा उससे दूर हो जाता है। हमें अपने अंदर जमा हुए अँधेरे को दूर करने के लिए दीया बनना होगा। भगवान बुद्ध ने भी कहा, अप्पो डिप्पो भव। इसका मतलब है कि आप अपने दीपक थे। दीवाना का अर्थ है जलना, जलना और चमकना। जब आप खुद को जलाकर दुनिया को रोशन करेंगे, तो अंधेरे की परतें अपने आप घुलने लगेंगी।

क्या आपने उस मछुआरे की कहानी सुनी है? एक आदमी अँधेरे में जल्दी मछली पकड़ने जाता, और तब तक इंतज़ार करता जब तक कि वह उजाला न हो जाए। जैसे ही प्रकाश हुआ, मैंने मछली पकड़ना शुरू कर दिया। एक दिन अँधेरे में उसने किनारे से एक छोटा सा थैला लगाया। कंकड़ अंदर अगर वह खोला। रोशनी होने तक क्या करें? वह थैले से कंकड़ निकाल कर एक-एक कर नदी में फेंक कर समय व्यतीत करने लगा। जब सूरज की पहली किरण उस तक पहुंची तो उसके पास केवल दो कंकड़ थे, जब उनमें से एक को फेंका गया तो वह सूरज की रोशनी में चमक उठा, अफसोस! क्या हुआ जब उसने आखिरी कंकड़ देखा जिसे वह जानता था, तो वह जानता था कि यह एक असली हीरा था। रात के अंधेरे में आपके हाथ में सबसे कीमती रत्न भी कंकड़ की तरह दिखते हैं। इसलिए हमें अपने दिल में दीया जलाना है। ताकि हमारे अंदर का हीरा अँधेरे में बर्बाद ना हो। हमारी दुर्दशा के अंधेरे में हमारी सुंदरता के हीरे बर्बाद हो रहे हैं।

एक दीपक प्रत्येक वस्तु को उसका मूल रूप देता है, अर्थात उसे दृश्यमान बनाता है। वरना अंधेरे में सांप या रस्सी? दीपक बिना किसी अपेक्षा के लगातार जलता रहता है, उसे बिना किसी अपेक्षा के विद्रोह का इतना सरल ज्ञान किससे प्राप्त होता? जिस क्षण दीपक जलता है, उसी क्षण वह शाश्वत हो जाता है। इस आने वाले त्योहार में आप भी कोशिश करें कि किसी के जीवन में एक दीप जलाएं, दूरियों का अँधेरा भी कुचल जाए! ऐसे दीपक को प्रणाम जो प्रकाश को जगाए!

लॉग आउट:

हे दीपक! आपको नमन

अँधेरे में सूरज और चाँद का काम करना

आपकी मुट्ठी की किरणों की क्या अवर्णनीय तपस्या है!

पथभुल्यने प्राण पाई कहता – आगल धप,

पैरों में गति हो तो थोड़ा कल्पित आश्रय मिलेगा।

हे दीपक! में तुम्हें सलाम करता हुँ …

तूने प्रजा से लड़ने की मन्नत मानी है,

हे दीपक! आप तब तक चलते हैं जब तक आप टिकते हैं!

तेरे साथ बुझी हुई सारी बातें

! मेरे लिए…

— रमेश पारेख

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